बरसात की आवाज़ मुझे याद नहीं

By Bhargavi G. Iyer

कई बादल गुज़र चुके हैं ।

नदियां, झरने, सब रुके हैं ।

मिट्टी में दरारें पड़ने लगी हैं,

जग में सारे जग सूखे हैं ।

मौसम की मुस्कानों का अब मोर से संवाद नहीं,

प्यासे मन की है पुकार । बरसात की आवाज़ मुझे याद नहीं ।

टपकते छत से पानी चखते,

घर में आधी छत्री न रखते ।

पहली बारिश की प्रतीक्षा में भीगे,

सड़कों में कागज़-नावों के संग तैर सकते ।

ऋतुओं की चाहतों की तरह, ये बूंदें अब आज़ाद नहीं,

सन्नाटों के शोर में फँसी, बरसात की आवाज़ मुझे याद नहीं ।

जब मिश्रित होता है रेत और जल,

चमक उठता है हर ताज महल ।

पानी में अमीर स्थान हो समृद्ध,

रौशनी से भरा रहता है हर कल ।

किसी और के लोभ में डूबे, ये मोती अब आबाद नहीं,

लुटेरों की घंटी गूंजे । बरसात की आवाज़ मुझे याद नहीं ।

हवा चले सीटी बजाकर,

बिजली बजे गर्जन सजाकर,

छाता खुलने की ध्वनि भी न भूली,

कांपते मेघ के पीछे, खामोश छिपा दिवाकर ।

पर इस सच्चे दिल को, इतना भी आशीर्वाद नहीं,

स्मृति के संघर्ष के बावजूद, बरसात की आवाज़ मुझे याद नहीं।



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