IKSHAYEIN

By Vrinda Tiwari

दरिंदों की कैद से छूटा वो जिस्म

पर वो रूह की चीखें आज भी आबाद हैं

वीरान है ये दिल फ़िलहाल

पर अपने वजूद पर आज भी सवाल बेशुमार हैँ

आज तुमसे कुछ बातें करने की ईक्षाएं मेरी हज़ार हैँ |

वो कहते है कि समय और लहरें किसी के लिए नहीं रूकती

पर आज फिर उन्हें रोकने की मेरी ये मुराद है

अपने अतीत से तुम्हे महरूम रखने के लिए

ये समाज नाम का चौकीदार करता मुझपे धिक्कार है

हाँ छिपाया सच मैंने,

हाँ छिपाया सच मैंने

रफ़्ता रफ़्ता उस ज़्यादती को याद बनाने की कोशिशें की हर रात हैँ

पर आज तावक्को लिए आयी हूं तुम्हारे सामने

कि उन मुजरिमो को मिलेंगी हज़ारो सज़ाएँ जिन्होंने मचाया था उस रात हाहाकार है

हां आज तुमसे कुछ बातें करने की ईक्षाएं मेरी हज़ार हैँ |

उस हवस, उस तालाब को मिटाने के लिए एक ज़िंदा लाश बना दिया

था मुझे

मेरी आत्मा को नोंचने की कोशिशें की सैकड़ो बार हैँ

आज सीता नहीं, आज सतयुग की सीता नहीं,

रज़िया बनकर आयी हूं तुम्हे अतीत से वाकिफ करवाने की पिंजरे में कैद होकर, उस अर्श को चूमने के सपने टूटे कइयों बार हैँ,

हां आज तुमसे कुछ बातें करने की इक्षाएं मेरी हज़ार हैँ |

ऐसे क्या देख रहें हो

ऐ मेरे दोस्त, इस तरह ना देख

पाख से नापाक की संज्ञा देनी तो बहुत ही आसान है

उस लड़की के साथ खड़े होकर इस ज़ुल्म का डटकर सामना करना

इस जिस्म से रूह तक की रक्षा करने वाला ही दुनिया का सबसे बड़ा पहरेदार है

हां आज तुमसे कुछ बातें करने की इक्षाएं मेरी हज़ार हैँ

तुमसे कुछ बातें करने की इक्षाएं मेरी हज़ार हैँ |



Processing…
Success! You're on the list.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Kirit P. Mehta School of Law Publications